नक्सल बाद - एक टिपण्णी
भारत में नक्सल बाद का विस्तार और यह तेजी से , सोच ने की बात है. कुछ मीडिया रिपोर्ट में खोज तै हुए कुछ जानकारी मिला. तो क्या हम यह मान ले की यह भारत सर्कार की पिछली ६० साल की लापर्बाही की प्रतिफल है. देखा जाये तोह कुछ हाड तक यह सही बात है. पिछले ससक दल की गैर जिमेंदारी कह बजह से या फिर लापर्बह सासन केलिए हमारे देश का सामूहिक विकास ( इन्क्लुसिवे ग्रोव्थ ) हो नहीं पाया . कुछ लोग जोह भारत सर्कार सासन से प्रत्य्ख्या रूप में जूद नहीं पाए वेह पीछे रहा गए . गरीबी , भूख , और अन्य मौलिक सुभिदएं ना पातेह हुए , सर्कार कोह दोषी ठहराए . तोह यह सही बात है की इस दुर्दश के लिए आवाज़ उठाना चाहिए. एक सामाजिक आन्दोलन जरूरी है और होना चाहिए.
लेकिन माओ बाद ही इस अन्दोलान का जरिया होना चाहिए यह किस हाड तक सही है , इस का भी आलोचना
होना चाहिए.जो लोग गरीब है , जिन को साधारण जीवन धारण केलिए हर दिन खून पसीना एक करना पाद रहा है.. उन लोगों को बंधूक और बारूद से लढाई सिखाना और हमला करवाना क्या उनका विकास मूलक कार्यक्रम है ?
यह गरीब जन साधारण केलिए कोई ठोस कदम तोह नहीं हुआ . आन्दोलन का भीती सुद्रूध्हा(स्ट्रोंग) जरूरी होना चाहिए. नेता या लीडर को ऐसा राह दिखाना चाहिए जिसमें चलके गरीबोंको एक उन्नत जीवन मिले. सामाजिक परिवर्तन केलिए हर एक कदम दूर दर्शी होना चाहिए, हर एक कार्य जो आन्दोलन करी कर रहे है , उनको यह सोच ना चाहिए और द्यान्में रख ना चाहिए की उससे उनका विकास हो रा हा है, उनको एक रोजगार और नई बेहतर जीवन का साधन मिल रहा है. क्या यह गोरिला वर या बंधूक बारूद से उनको एक नया जीवन साधन का जरिया मिल रहा है.. जिसको अपना के वेह उनका और उनके आने वाले पिधिओं के लिए एक बेहतर दुनिया टायर कर रहे है... शायद नहीं.
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